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ईंट की दीवार


एक नदी के किनारे पर ऊंची दीवार थी। उसपर एक प्यासा आदमी बैठा हुआ था। बिना पानी के उसके प्राण निकले जा रहे थे। दीवार पानी तक पहुंचने में रुकावट डालती थी और वह प्यास के मारे व्याकुल हो रहा था। उसने दीवार की एक ईंट उखाड़कर पानी में जो फेंकी तो पानी की आवाज कान में आयी। वह आवाज भी उसे ऐसी प्यारी लगी, जैसे प्रेमपात्र की आवाज होती है। इसी एक आवाज ने शराब की सी मस्ती पैदा कर दी।

उस दुखियारे को पानी की ध्वनि में इतना आनन्द आया कि वह दीवार में से ईंटें उखाड़कर पानी में फेंकने लगा। पानी की यह दशा थी, मानो वह कह रहा था कि ऐ भद्र परुष, भला मेरे ईंटें मारने से तुझे क्या लाभ? प्यासा भी मानो अपनी दशा से यह प्रकट कर रहा था कि मेरे इसमें दो लाभ हैं। इसलिए मैं इस काम से कभी हाथ नहीं रोकूंगा। पहला लाभ तो पानी की आवाज का सुनना है। यह प्यासों के लिए रबाब (एक प्रकार का बाजा) की आवाज से अधिक मधुर है। दूसरा लाभ यह है कि जितनी ईंटें मैं इस दीवार की उखाड़ता जाता हूं, उतना ही निर्मल जल के निकट होता जाता हूं, क्योंकि इस ऊंची दीवार से जितनी ईंटें उखड़ती जायेंगी, उतनी ही दीवार नीची होती चली जायेगी। दीवार का नीचा होना पानी के निकट होना है।"



[ईंटों की चिनाई का उखाड़ना वन्दना (प्रणति) है। जबतक इस दीवार की गर्दन ऊंची हे, वह सिर को झुकाने नहीं देती। इसलिए जबतक इस पंच भौतिक शरीर से मुक्ति न प्राप्त हो, अमृत (अमर जीवन) के आगे सिर नहीं झुक सकता। इस यौवन के महत्व को समझकर सिर झुकाना चाहिए और बुढ़ापा आने से पहले यानी उस समय से पहले जब कि तेरी गर्दन बढ़ी हुई रस्सी से बंध जायेगी और बुरी आदतों की जड़ें ऐसी मजबूत हो जायेंगी कि उनके उखाड़ने की ताकत न रहे, अपनी दीवार (दुर्वासनाओं) के ढेलों और ईंटों को उखाड़कर फेंक दे।]१
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अच्छे-बुरे की परीक्षा


एक बादशाह ने दो गुलाम सस्ते दाम में खरीदे। एक से बातचीत की तो वह गुलाम बड़ा बुद्धिमान और मीठा बोलने वाला मालूम हुआ, और जब होठ ही मिठास के बने हुए हों तो उनमें शरबत को छोड़ और क्या निकलेगा? मनुष्य की मनुष्यता उसकी वाणी में भरी हुई है। जब इस गुलाम की परीक्षा कर चुका तो दूसरे को पास बुलाकर बादशाह ने देखा कि इसके दांत काले-काले हैं और मुंह गन्दा है। बादशाह इसके चेहरे को देखकर खुश नहीं हुआ, परन्तु उसकी योग्यता और गुणों की जांच करने लगा। पहले गुलाम को तो उसने कह दिया कि जा, और नहा-धोकर आ। दूसरे से कहा, "तू अपना हाल सुना। तू अकेला ही सौ गुलामों के बराबर है। तू ऐसा मालूम नहीं होता, जैसा तेरे साथी ने कहा था और उसने हमें तेरी तरफ से बिल्कुल निरश कर दिया था।"

गुलाम ने जवाब दिया, "यह बड़ा सच्चा आदमी है। इससे ज्यादा भला आदमी मैंने कोई नहीं देखा। यह स्वभाव से ही सत्यवादी है। इसलिए इसने जो मेरे संबंध में कहा है, यदि ऐसा ही मैं इसके बारे में कहूं तो झूठा दोष लगाना होगा। मैं इस भले आदमी की बुराई नहीं करुंगा। इससे तो यही अच्छा है कि अपने को दोषी मान लूं। बादशाह सलामत! सम्भव है कि वह मुझमें जो ऐब देखता हैं, वह मुझे खुद न दीखते हों।"

बादशाह ने कहा, "तू भी इसके अवगुणों का बखान कर, जैसा कि इसने तेरे दोषों का किया है, जिससे मुझे इस बात का विश्वास हो जाये कि तू मेरा हितैशी है और शासन के प्रबन्ध में मेरी सहायता कर सकता है।"



गुलाम बोला, "बादशाह सलामत! इस दूसरे गुलाम में नम्रता और सच्चाई हैं। वीरता और उदारता भी ऐसी है कि मौका पड़ने पर प्राण तक न्यौछावर कर सकता है। चौथी बात यह है कि वह अभिमानी नहीं और स्वयं ही अपने अवगुण प्रकट कर देता है। दोषों को प्रकट करना और ऐब ढ़ूंढ़ना हालांकि बुरा है तो भी वह दूसरे लोगों के लिए अच्छा है और अपने लिए बुरा हे।"

बादशाह ने कहा, "अपने साथी की प्रशंसा में अति न कर और दूसरे की प्रशंसा के सहारे अपनी प्रशंसा न कर, क्योंकि यदि परीक्षा के लिए इसे मैं तेरे सामने बुलाऊं तो तुझको लज्जित होना पड़ेगा।"

गुलाम ने कहा, "नहीं, मेरे साथी के सदगुण इससे भी सौ गुने हैं। जो कुछ मैं अपने मित्र के संबंध में जानता हूं, यदि आपको उसपर विश्वास नहीं तो मैं और क्या निवेदन करूं!"

इस तरह बहुत-सी बातें करके बादशाह ने उस कुरूप गुलाम की अच्छी तरह परीक्षा कर ली और जब पहला गुलाम स्नान करके बाहर आया तो उसको अपने पास बुलाया। बदसूरत गुलाम को वहां से बिदा कर दिया। उस सुन्दर गुलाम के रूप और गुणों की प्रशंसा करके कहा, "मालूम नहीं, तेरे साथी को क्या हो गया था कि इसने पीठ-पीछे तेरी बुराई की!"

इसगुलाम ने भौं चढ़ाकर कहा, "ऐ दयासागर! इस नीच ने मेरे बारे में जो कुछ कहा; उसका जरा-सा संकेत तो मुझे मिलना चाहिए।"

बादशाह ने कहा, "सबसे पहले मेरे दोगलेपन का जिक्र किया कि तू प्रकट में दवा और अन्तर में दर्द है।"

जब इसने बादशाह के मुंह से ये शब्द सुने तो इसका क्रोध भड़क उठा, चेहरा तम-तमाने लगा और अपने साथी के संबंध में जो कुछ मुंह में आया, बकने लगा। बुराइयां कतरा ही चला गया तो बादशाह ने इसके होंठों पर हाथ रख दिया कि बस, हद हो गयी। तेरी आत्मा गन्दी है और उसका मुंह गन्दा है। ऐ गन्दी आत्मावाले! तू दूर बैठ। वह गुलाम अधिकारी बने और तू उसके अधीन रह।

[याद रखो, सुन्दर और लुभावना रूप होते हुए भी यदि मनुष्य में अवगुण हैं तो उसका मान नहीं हो सकता। और यदि रूप बुरा, पर चरित्र अच्छा है तो उस मनुष्य के चरणों में बैठकर प्राण विसर्जन कर देना भी श्रेष्ठ है।] १
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'तू' और 'मैं'


एक मनुष्य अपने प्रेमपात्र के दरवाजे पर आया और कुंडी खटखटायी। प्रेमपात्र ने पूछा, "कौन है?"

बाहर से जवाब मिला, 'मैं' हूं।"

प्रेमपात्र ने कहा, "तुम्हें लौट जाना चाहिए। अभी भेंट नहीं हो सकती। तुम जैसी कच्ची चीज के लिए यहां स्थान नहीं।"

उसने समझा कि प्रेमपात्र का मुझसे अपमान हुआ है।

यह जवाब सुनकर वह बेचारा प्रेमी निराश होकर अपने प्रेमपात्र के द्वारा से लौट गया। बहुत दिनों तक वियोग की आग में जलता रहा। अन्त में उसे फिर प्रेमपात्र से मिलने की उत्कण्ठा हुई और उसके द्वार पर चक्कर काटने लगा। कहीं फिर काई अपमानसूचक शब्द मुंह से न निकल जाये, इसलिए उसने डरते-डरते कुंडी खटखटायी। प्रेमपात्र ने भीतर से पूछा, "दरवाजे पर कौन है?"

उसने उत्तर दिया, "ऐ मेरे प्यारे, 'तू' ही है।"

प्रेम-पात्र ने आज्ञा दी कि अब जबकि 'तू' 'मैं' ही है, तो अन्दर चला आ।"

[एकता में दो की गुंजाइश नहीं। जब एक ही एक है तो फिर दुई कहां?] १




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मन को मार


एक आदमी ने अपनी स्त्री को मार डाला। परिचितों ने कहा, "अरे दुष्ट! तूने अपनी स्त्री को मार डाला और उसकी सेवा को भूल गया। हाय-हाय, अभागे! भला बता तो सही, स्त्री-हत्या का पाप किसी भी जन्म में धो सकेगा? बात क्या थी और उसने क्या अपराध किया था?"

वह बोला, "उसने वह किया कि जिसमें उसकी बदनामी थी और मैंने उसको इसलिए मार डाला कि मिट्टी उसके दोषों को छिपा लेगी। उसका एक आदमी से अनुचित संबंध था इसलिए मैंने उसको मार डाला और खून में लिथड़ी हुई उसकी लाश को कब्र की मिट्टी में छिपा दिया।"

उस आदमी ने कहा, "ऐसा लज्जाशील था तो उस दुराचारी आदमी को क्यों नहीं मार डाला?"

उसने जवाब दिया, "फिर तो प्रतिदिन एक मनुष्य का वध करना पड़ता। बस उसको मारकर मैं रोज-रोज के रक्तपात से बच गया। उस अकेली का गला काटना बहुत से लोगों के गले काटने से अच्छा था।"

[मन उस दुराचारिणी स्त्री के समान है, जिससे सारा वातावरण दूषित हो रहा है। अत: उसको मारना चाहिए, अर्थात् वश में करना चाहिए, क्योंकि इस दुष्ट के कारण हर घड़ी किसी न किसीसे लड़ाई होने का अंदेशा है। मन की वासनाओं के कारण यह सुखमय संसार दु:खदायी बना हुआ है। यदि मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया जाये तो दु:ख और सुख पास न आयें और सारा संसार मित्र बनकर रहे।] १




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वैयाकरण और मल्लाह


एक वैयाकरण नाव में सवार था। वह घमंड में भरकर मल्लाह से कहने लगा, "क्या तुमने व्याकरण पढ़ा है?"

मल्लाह बोला, "नहीं।"

वैयाकरण ने कहा, "अफसोस है कि तुने अपनी आधी उम्र यों ही गंवा दी!"

मांझी को बड़ा क्रोध आया। लेकिन उस समय वह कुछ नहीं बोला। दैवयोग से वायु के प्रचंड झोंकों ने नाव को भंवर में डाल दिया।

नाविक ने ऊंचे स्वर में वैयाकरण से पूछा, "महाराज, आपको तैरना भी आता है कि नहीं?"

वैयाकरण ने कहा, "नहीं, मुझे तैरना नही आता।"

नाविक ने कहा, "वैयाकरण, तेरी सारी उम्र बरबाद हो गयी, क्योंकि नाव अब भंवर में डूबने वाली है।"

[मनुष्य को किसी एक विद्या या कला में दक्ष हो जाने पर गर्व नहीं करना चाहिए।] १




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कांटों की झाड़ी



एक मुंह के मीठे और दिल के खोटे मनुष्य ने रास्ते के बीच में कांटों की झाड़ी उगने दी। जो पथिक उधर से निकलता, वही धिक्कार कर कहता कि इसको उखाड़ दे; लेकिन उसको वह उखाड़ता नहीं था, न उखाड़ा। इस झाड़ी की यह दशा थी कि प्रत्येक पल बढ़ती जाती थी और लोगों के पैर कांटे चुभने से लहू-लुहान हो जाते। जब हाकिम को इसकी खबर पहुंची और इस मनुष्य के पूर्ण आचरण का ज्ञान हुआ तो उसने झाड़ी को तुरन्त उखाड़ देने की आज्ञा दी। इस पर भी वह मनुष्य और जवाब दिया कि किसी फुर्सत के दिन उखाड़ डालूंगा। इस तरह बराबर टालमटोल करता रहा, यहां तक कि झाड़ी ने खूब मजबूत जड़ पकड़ ली।

एक दिन हाकिम ने कहा, "ऐ प्रतिज्ञा भंग करनेवाले, हमारी आज्ञा का पालन कर। बस अब एड़ियां न रगड़। तू जो रोज कल का वादा करता है। यह समझ कि जितना अधिक समय गुजरता जायेगा, उतना ही अधिक बुराई का वृक्ष पनपता जायेगा और उखाड़ने वला बुड्ढा और भी कमजोर होता जायेगा। पेड़ मजबूत और बड़ा होता जाता है। जल्दी कर और मौके को हाथ से न जाने दे।"

[मनुष्य की हर बुरी आदत कांटों की झाड़ी है। वह अनेक बार अपने आचरणों पर लज्जित होकर पश्चात्ताप करता है। वह अपनी आदतों से स्वयं भी तंग आ जाता है, फिर भी उसकी आंखें नहीं खुलतीं। दूसरों के कष्ट जो उसके ही स्वभाव के कारण हैं, अगर वह उसकी परवा नहीं करता तो न सही; लेकिन उसे अपने घाव का अनुभव तो होना ही चाहिए।] 


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दूरदर्शी


एक आदमी सोना तोलने के लिए सुनार के पास तराजू मांगने आया। सुनार ने कहा, "मियां, अपना रास्ता लो। मेरे पास छलनी नहीं है।"

उसने कहा, "मजाक न कर, भाई, मुझे तराजू चाहिए।"

सुनार ने कहा, "मेरी दुकान में झाडू नहीं हैं।"

उसने कहा, "मसखरी को छोड़ दे, मैं तराजू मांगने आया हूं, वह दे दे और बहरा बन कर ऊटपटांग बातें न कर।"सुनार ने जवाब दिया, "हजरत, मैंने तुम्हारी बात सुन ली थी, मैं बहरा नहीं हूं। तुम यह न समझो कि मैं गोलमाल कर रहा हूं। तुम बूढ़े आदमी सूखकर कांटा हो रहे हो। सारा शरीर कांपता हैं। तुम्हारा सेना भी कुछ बुरादा है और कुछ चूरा है। इसलिए तौलते समय तुम्हारा हाथ कांपेगा और सोना गिर पड़ेगा तो तुम फिर आओगे कि भाई, जरा झाड़ू तो देना ताकि मैं सोना इकट्ठा कर लूं और जब बुहार कर मिट्टी और सोना इकट्ठा कर लोगे तो फिर कहोगे कि मुझे छलनी चाहिए, ताकि खाक को छानकर सोना अलग कर दूं। हमारी दुकान में छलनी कहां? मैंने पहले ही तुम्हारे काम के अन्तिम परिणाम को देखकर दूरदर्शी

कहा था कि तुम कहीं दूसरी जगह से तराजू मांग लाओ।"

[जो मनुष्य केवल काम के प्रारम्भ को देखता है, वह अन्धा है। जो परिणाम को ध्यान में रक्खे, वह बुद्धिमान है। जो मनुष्य आगे होने वाली बात को पहले ही से सोच लेता है, उसे अन्त में लज्जित नहीं होना पड़ता।]१




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सच्चा प्रेम


एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री थी, परी के समान। वह रास्ता चले हुए किसी कारण से खड़ी हो गयी। उसने देखा कि एक आदमी उसकी तरफ चला आ रहा है। जब पास आया तो उस स्त्री पर वह ऐसा मोहित हुआ कि उसे तन-मन की सुधि तक न रही। जब जरा होश हुआ तो उस सत्री की तरफ देखने लगा और फिर ऐसा आपे से बाहर हुआ कि उस सुन्दर रूप को अपने बाहु-पाश में बन्दी बनाने को तैयार हो गया। इस इरादे से वह आगे बढ़ा ही था कि स्त्री तुरन्त पीछे हट गयी और कहने लगी, "क्या बात है, जो इस तरह बढ़े चले आ रहे हो और सभ्यता की सीमा से बाहर जा रहे हो?"

पुरुष ने जवाब दिया, "यह सब तेरे रूप का जादू है। तेरे हाव-भावो ने तीर बरसाये हैं। क्या कहूं, तेरे सौन्दर्य ने मेरे हृदय को छीन लिया है। और जब अपने ऊपर तेरा अधिकार होते देखा है तो मुझे भी यह साहस हो गया कि अपनी रक्षा के लिए आगे बढ़कर वार करना चाहिए। अब तो मैं तेरा ही इच्छुक हूं। जबतक तुझे नहीं पा लूंगा, शान्ति नहीं मि सकती।"



वह स्त्री बोली, "मेरे पीछे मेरी एक दासी है। मुझसे भी अधिक सुन्दरी है। जब तू उसे देखेगा तो बड़ा खुश होगा। देख यह सामने से चली आ रही है।"

पुरुष ने पीछे मुड़कर देखा। दासी का कहीं पता न चला। जब देखते-देखते थक गया तो उस सुन्दरी ने बड़े जोर से एक तमाचा मारा और बोली, "ऐ कपटी! तुमको शर्म नहीं आती कि मेरे प्रेम का दावा करता हुआ भी दूसरे की तलाश करता है? तुझको प्रेमी बनने का अधिकार नहीं। तू प्रेमी नहीं, बल्कि धोखेबाज है।"

[हे आत्मन्! तू केवल परमात्मा का प्रेमी बन और माया-रूपी दुनिया कितनी सुन्दर हो, उससे मन न लगा, यहां तक कि सिवा परमात्मा के किसी से भी इच्छा न कर। न किसी के स्पर्श करने की कामना कर। किसी की गन्ध तक मल ले और न उसके अतिरिक्त किसी का ध्यान कर। तू भ्रम-जाल में फंसेगा तो उस परमात्मा के हाथों हानि उठायेगा] 
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तोता और गंजा फकीर


एक पंसारी के यहां तरह-तरह की बोलियां बोलने वाला एक बहुत सुन्दर तोता था। वह तोता दुकान की देख-रेख करता और प्यारी-प्यारी बोलियां बोलकर आन-जानेवालों का मनोरंजन किया करता था। एक दिन ऐसा संयोग हुआ कि मालिक अपने घर गया हुआ था और तोता दुकान की निगरानी कर रहा था। इतने में एक बिल्ली चूहे पर झपटी, तोता अपनी जान बचाने के लिए जैसे ही एक तरफ को भागा कि दौड़-धूप में बादाम रोगन की कुछ बोतले लुढ़क गयीं।

जब मालिक घर से आया तो देखा कि तेल से तमाम फर्श चिकना हो गया है। पंसारी ने गुस्सा होकर तोते को ऐसी चोट मारी कि उसके सिर के बाल उड़ गये। इस रंज की वजह से तो तोते ने बोलना-चालना बिल्कुल छोड़ दिया। पंसारी अपने इस आचरण पर पश्चात्ताप करने लगा। वह बार-बार अपने जी में कहा कि क्या ही अच्छा होता, यदि मेरे हाथ उस घड़ी से पहले ही टूट जाते, जिस समय मैंने इस तोते को मारा था।


पंसारी ने अनेक प्रयत्न किये कि तोता बोलने लगे, परन्तु उसने एक शब्द तक भी अपने मुंह से नहीं निकाला। इसी तरह कई दिन गुजर गये, पंसारी अपनी दुकान पर बैठा हुआ इसी चिन्ता में मग्न था और सोचता था कि मेरा तोता कभी बोलेगा भी या नहीं, इतने में एक साधु सिर घुटाये हुए उस तरफ से निकले।

तोते ने तुरन्त साधु पर कटाक्ष किया और कहा कि ओ गंजे, शायद तूने भी तेल की बोतल गिरायी है, तो तुझे गंजा होना पड़ा।

सुननेवाले खूब हंसे कि लो साहब, यह तोता साधु को भी अपने समान समझता है।

[अपनी दशा के अनुसार संसार के अन्य सज्जन मनुष्यों और महापुरुषों की हालत का अन्दाज नहीं करना चाहिए। अक्सर ऐसा हुआ है कि लोगों ने महान आत्माओं को नही पहचाना, उनके उपदेशों पर अमल नहीं किया और पथ-भ्रष्ट हो गये।] 

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नि:स्वार्थ दान


हजरत उमर की खिलाफत के जमाने में एक शहर में आग लग गयी। वह ऐसी प्रचंड अग्नि थी, जो पत्थर को भी सूखी लकड़ी की तरह जलाकर राख कर देती थी। वह मकान और मुहल्लों को भी जलाती हुई पक्षियों के घोंसलों तक पहुंची और अंत में उनके परो में भी लग गयी। इस आग की लपटों ने आधा शहर भून डाला, यहां तक कि पानी भी इस आग को न बुझा सका। लोग पानी और सिरका बरसाते थे, परन्तु ऐसा मालूम होता था कि पानी और सिरका उल्टा आग को तेज कर रहो हैं। अन्त में प्रजा-जन हजरत उमर के पास दौड़ आये और निवेदन किया कि आग किसी से भी नहीं बुझती।

हजरत उमर न फरमाया, "यह आग भगवान के कोप का चिह्न है और यह तुम्हारी कंजूसी की आग का एक शोला हैं। इसलिए पानी छोड़ दो और रोटी बांटना शुरू करो। यदि तुम भविष्य में मेरी आज्ञा का पालन करना चाहते हो तो मंजूसी से हाथ खींच लो।"


जनता ने जवाब दिया, "हमने पहले से खैरात के दरवाज खोल रखे हैं और हमेशा दया और उदारता का व्यवहार करते रहे हैं।"

हजरत उमर ने उत्तर दिया, 'यह दान तुमने निष्काम भावना से नहीं किया, बल्कि जो कुछ तुमने दिया है, वह अपना बड़प्पन प्रकट करने और प्रसिद्धि के लिए दिया है। ईश्वर के भय और परोपकार के लिए नहीं दिया। ऐसे दिखावे को उदारता और दान से कोई लाभ नहीं है।"

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चूहा और ऊंट


एक चूहे के हाथ ऊंट की नकेल लग गयी। वह बड़ी शान से खींचता हुआ चला। ऊंट जो तेजी से उसके पीछे चला तो चूहे के दिमाग में यह घमण्ड पैदा हो गया कि मैं भी पहलवान हूं। ऊंट चूहे के भावों को ताड़ गया और दिल में सोचा, अच्छा, तुझे इसका मजा चखाऊंगा। चलते-चलते वे एक बड़ी नदी के किनारे पहुंचे, जहां इतना गहरा पानी था कि हाथी भी डूब जाये। चूहा वहीं ठिठककर बैठ गया।

ऊंट ने कहा, "जंगलों और पहाड़ों के साथी, तुम क्यों रुक गये और इस समय क्या चिन्ता है? आओ, साहस करके नदी में उतरो। तुम तो सरदार और आगे-आगे चलनेवाले हो, बीच रास्ते में ठहरकर हिम्मत न हारो।"

चूहे ने जवाब दिया, "नदी का पाट बहुत चौड़ा है और मुझे इसमें डूब जाने का डर है।"

ऊंट ने कहा, "अच्छा, मैं देखू पानी कितना गहरा है।"


यह कहकर नदी में पैर रखा और कहा, "अरे चूहे, इसमें तो सिर्फ जांघ तक पानी हैं तू ऐसा विचलित और परेशान क्यों हो गया?"

चूहे ने कहा, "जो चीज तेरे आगे चींटी है, वही हमारे लिए अजगर है, क्योंकि जांघ जांघ का भी फर्क हैं अगर पानी तेरी जांघ तक है तो मेरे सिर से भी गजों ऊंचा होगा।"

ऊंट ने कहा, "खबरदार, आगे फिर कभी ऐसी गुस्ताखी न करना, नहीं तो स्वयं हानि उठायेगा। अपने जेसे चूहों के आगे तुम चाहे कितनी ही डींग हांको, परन्तु ऊंट के आगे चूहा जीभ नहीं हिला सकता!"

चूहे ने कहा, "मैं तौबा करता हूं। ईश्वर के लिए इस खतरनाक पानी से मेरी जान बचाओ।"

ऊंट को दया आयी और कहा, "अच्छा, मेरे कोहान पर चढ़कर बैठ जा। इस तरह आर-पार होना मेरा काम है। तुझ जैसे हजारों को नदी पार करा चुका हूं।"

[ऐ मनुष्य, जब तू पैगम्बर नहीं तो निर्दिष्ट मार्ग से चल, जिससे कि कुएं-खाई से बचकर आसानी से अपने लक्ष्य पर पहुंच जाये। जब तू बादशाह नहीं तो प्रजा बनकर रह और जब तू मल्लाह नहीं तो नाव को न चला। तांबे की तरह रसायन का सहारा ले। ऐ मनुष्य! तू महापुरुषों की सेवा कर।] 

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हुदहुद और कौआ


जब सुलेमान के उत्तम शासन की धूम मची, तो सब पक्षी उनके सामने विनीत भाव से उपस्थित हुए। जब उन्होंने यह देखा कि सुलेमान उनके दिल का भेद जाननेवाला और उनकी बोली समझने में समर्थ है तो पक्षियों का प्रत्येक समूह बड़े अदब के साथ दरबार में उपस्थित हुआ।

सब पक्षियों ने अपनी चहचहाहट छोड़ दी और सुलेमान की संगति में आकर मनुष्यों से भी अधिक उत्तम बोली बोलने लगे। सब पक्षी अपनी-अपनी चतुराई और बुद्धिमानी प्रकट करते थे। यह आत्म-प्रशंसा कुद शेखी के कारण न थी; बल्कि वे सुलेमान के प्रति पक्षी-जगत् के भाव व्यक्त करना चाहते थे, जिससे सुलेमा को उचित आदेश देने और प्रजा की भलाई करने में सहायता मिले। होते-होते हुदहुद की बारी आयी। उसने कहा, "ऐ राज! एक ऐसा गुण, जो सबसे तुच्छ है, मैं बतलाता हूं, क्योंकि संक्षिप्त बात ही लाभकारी होती है।"

सुलेमान ने पूछा, "वह कौन-सा गुण है?"

हुदहुद ने उत्तर दिया, "जब मैं ऊंचाई पर उड़ता हूं तो पानी को, चाहे वह पाताल में भी हो, देख लेता हूं और साथ ही यह भी देख लेता हूं कि पानीद कहां हे, किस गहराई में है और किस रंग का है? यह भी जान लेता हूं कि वह पानी धरती में से उबल रहा है या पत्थर से रिस रहा है? ऐ सुलेमान! तू अपनी सेना के साथ मुझ-जैसे जानकार को भी रख।"


हजरत सुलेमान ने कहा, "अच्छा, तू बिना पानीवाले स्थानों और खतरनाक रेगिसतानों में हमारे साथ रहा कर, जिससे तू हमें मार्ग भी दिखाता रहे और साथ रहकर पानी की खोज भी करता रहे।"

जब कौए ने सुना कि हुदहुद को यह आज्ञा दे दी गयी, अर्थात् उसे आदर मिल गया है तो उसे डाह हुई और उसने हजरत सुलेमान से निवेदन किया, "हुदहुद ने बिल्कुल झूठ कहा है और गुस्ताखी की है। यह बात शिष्टाचार के खिलाफ है कि बादशाह के आगे ऐसी झूठ बात कही जाये, जो पूरी न की जा सके। अगर सचमुच उसकी निगाह इतनी तेज होती तो मुठ्टी-भर धूल में छिपा हुआ फन्दा क्यों नहीं देख पता, जाल में क्यों फंसता और पिंजरे में क्यों गिरफ्तार होता?" हजरत सुलेमान बोले, "क्यों रे हुदहुद! क्या यह सच है कि तू मेरे आगे जो दावा करता है वह झूठ है?"

हुदहुद ने जवाब दिया, "ऐ राजन्, मुझे निर्दोश गरीब के विरुद्ध शत्रु की शिकायतों पर ध्यान न दीजिए। अगर मेरा दावा गलत हो तो मेरा यह सिर हाजिर है। अभी गर्दन उड़ा दीजिए। रही बात मृत्यु और परमात्मा की आज्ञा से गिरफ्तारी की, सो इसका इलाज मेरे क्या, किसी के भी पास नहीं है। यदि ईश्वर की इच्छा मेरी बुद्धि के प्रकाश को न बुझाये तो मैं उड़ते-उड़ते ही फन्दे और जाल को भी देख लूं। परन्तु जब ईश्वर की मर्जी ऐसी ही हो जाती है तो अकल पर पर्दा पड़ जाता हैं। चन्द्रमा काला पड़ जाता है और सूजर ग्रहण में आ जाता है। मेरी बुद्धि और दृष्टि में यह ताकत नहीं है कि परमात्मा की मर्जी का मुकाबला कर सके।"

२२/ चोर की चालाकी

एक मनुष्य ने अपने घर में एक चोर को देखा और जब वह निकलकर भागा तो उसके पीछे दौड़ा कि देह थककर चूर-चूर हो गयी। जब चोर के इतना पास पहुंच गया कि उसको पकड़ ले तो दूसरे चोर ने पुकारकर कहा, "अरे मियां! यहां आओ। यहां तो देखों कि यहां कितने निशान मौजूद हैं। जल्दी लौटकर आओ।"

गृहस्वामी ने यह आवाज सुनी तो उसे डर लगने लगा। सोचने लगा, शायद दूसरे चोर ने किसी को मार डाला है या हो सकता है, वह मुझपर भी पीछे से टूट पड़। हो सकता है कि बाल-बच्चों पर भी हाथ साफ करे। तो फिर इस चोर के पकड़ने से क्या लाभ होगा?

यह सोचकर पहले चोर का पीछा करना छोड़ दिया और लौटकर वापस आया और उस आदमी से पूछा, "दोस्त! क्या बात है? तुम क्यों चिल्ला रहे थे?"

वह कहने लगा, "यह देखिए चोर के पैरों के निशान। वह दुष्ट अवश्य इस रास्ते से भागकर गया है। यह खोज मॉजूद है। बस, इसीको देखते-भालते उसके पीछे चले जाओ।"

गृहस्वामी ने कहा, "अरे मूर्ख! मुझे खोज क्या बताता है। मैंने असली चोर को दबा लिया था। तेरी चीख-चिल्लाहट सुनकर उसे छोड़ दिया। अरे बेवकूफ! यह तू क्या बेहूदा बक-वाद करता है। मैं तो लक्ष्य को पहुंच चुका था। भला निशान क्या चीज है! या तो तू गुण्डा है या बिल्कुल मूर्ख है। हो सकता है कि चोर तू ही हो और यह सब हाल तुझे मालूम हो।"

[मनष्य को अधिक लाभ का लालच देकर असली भलाई को रोका जा सकता है। इस तरह लाभ के बजाय हानि उठानी पड़ती है।] 

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लुकमान की परीक्षा


हजरत लुकमान यद्यपि स्वयं गुलाम और गुलाम पिता के पुत्र थे, परन्तु उनका हृदय ईर्ष्या और लोभ से रहित था। उनका स्वामी भी प्रकट में तो मालिक था, परन्तु वास्तव में इनके गुणों के कारण दिल से इनका गुलाम हो गया था। वह इनको कभी का आजाद कर देता, पर लुकमान अपना भेद छिपाये रखना चाहते थे और इनका स्वामी इनकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं करना चाहता था। उसे तो हजरत सुकमान से इतना प्रेम और श्रद्धा हो गयी थी कि जब नौकर उसके लिए खाना लाते तो वह तुरन्तु लुकमान के पास आदमी भेजता, ताकि हले वह खालें और उनका बचा हुआ वह खुद खाये। वह लुकमान का जूठा खकर खुश होता था और यहां तक नौबत पहुंच गयी थी कि जो खाना वह न खाते, उसे वह फेंक देता था और यदि खाता भी था तो बड़ी अरुचि के साथ।

एक बार किसी ने उनके मालिक के लिए खरबूज भेजे। मालिक ने गुलाम से कहा, "जल्दी जाओ और मेरे बेटे लुकमान को बुला लाओ।"


लुकमान आये और सामने बैठ गये। मालिक ने छुरी उठायी और अपने हाथ से खरबूजा काटकर एक फांक लुकमान को दी। उन्होंने ऐसे शौक से खायी कि मालिक ने दूसरी फांक दी, यहां तक कि सत्रहवीं फांक तक वे बड़े शौक से खाते रहे। जब केवल एक टुकड़ा बाकी रह गया तो मालिक ने कहा, "इसको मैं खाऊंगा, जिससे मुझे भी यह मालूम हो कि खरबूजा कितना मीठा है।"

जब मालिक ने खरबूजा खाया तो कड़वाहट से कष्ठ में चिरमिराहट लगने लगी और जीभ में छाले पड़ गये। घंटे-भर तक मुंह का स्वाद बिगड़ा रहा। तब उसने आश्चर्य के साथ हजरत मुकमान से पूछा, "ऐ दोसत, तूने इस जहर को किस तरह खाया और इस विष को अमृत क्यों समझ लिया? इसमें तो कोई संतोष की बात नहीं है। तूने खाने से बचने के लिए कोई बहाना क्यों नहीं किया?"

हजरत लुकमान ने जवाब दिया, "मैंने आपके हाथ से इतने स्वादिष्ट भोजन खाये हैं कि लज्जा के कारण मेरा सिर नीचे झुका जाता है। इसीसे मेरे दिल ने यह गवारा नहीं किया कि कड़वी चीज आपके हाथ से न खाऊं। मैं केवल कड़वेपन पर शोर मचाने लगूं तो सौ रास्तों की खाक मेरे बदन पर पड़े। ऐ मेरे स्वामी, आपके सदैव शक्कर प्रदान करने वाले हाथ ने इस खरबूजे में कड़वाहट कहां छोड़ी थी कि मैं इसकी शिकायत करता!" १

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पथ-प्रदर्शक


हजरत मुहम्मद के एक अनुयायी बीमार पड़े और सूखकर कांटा हो गये। वे उसकी बीमारी का हाल पूछने के लिए गये। अनुयायी हजरत के दर्शनों से ऐसे संभले कि मानो खुदा ने उसी समय नया जीवन दे दिया हो। कहने लगे, "इस बीमारी ने मेरा भाग ऐसा चमकाया कि दिन निकलते ही यह बादशाह मेरे घर आया। यह बीमारी और बुखार कैसा भाग्यवान है! यह पीड़ा और अनिद्रा कैसी शुभ है!"

हजरत पैगम्बर ने उस बीमार से काह, "तूने कोई अनुचित प्रार्थना की हैं। तूने भूल में विष खा लिया है। याद कर, तूने क्या हुआ की?"

बीमार ने कहा, "मुझे याद नहीं। परन्तु मैं यह अवश्य चाहता हूं कि आपकी कृपा से वह दुआ याद आ जाये।"

आखिर हजरत मुहम्मद की कृपा से वह दुआ उसको याद आ गयी।


उसने का, "लीजिए, वह दुआ मुझे याद आ गयी। आप सदैव अपराधियों को पाप करने से मना करते थे और पापों के दंड का डर दिलाते थे। इससे मैं व्याकुल हो जाता था। न मुझे अपनी दशा पर संतोष था और न बचने की राह दिखायी देती थी। न प्रायश्चित की आश थी, न लड़ने की गुंजाइश और न भगवान् को छोड़ कोई सहायक दिखायी देता था। मेरे हृदय में ऐसा भ्रम पैदा हो गया था कि मैं बार-बार यही प्रार्थना करता था कि हे ईश्वर, मेरे कर्मों का दण्ड मुझे इसी संसार में दे डाल, जिससे मैं संतोष के साथ मृत्यु का आलिंगन कर सकूं। मैं इसी प्रार्थना पर अड़कर बैठ जाता था। धीरे-धीरे बीमारी ऐसी बढ़ी कि घुल-घुलकर मरने लगा। अब तो यह हालत हो गयी है कि खुदा की याद का भी खयाल नहीं रहता और अपने-पराये का ध्यान भी जाता रहा। यदि मैं आपके दर्शन न करता तो प्राण अवश्य निकल जाते। आपने बड़ी कृपा की।"

मुहम्मद साहब ने काह, "खबरदार, ऐसी प्रार्थना फिर न करना! ऐ बीमार चींटी, तेरी यह सामर्थ्य कहां कि खुदा तुझपर इतना बड़ा पहाड़ रक्खे?"

अनुयायी ने कहा, "तोबा! तोबा! ऐ सुलतान! अब मैंने प्रतिज्ञा कर ली है कि कोई प्रार्थना बेसोच-समझे नहीं करूंगा। ऐ पथ-प्रदर्शक! इस निर्जन बन में आप ही मुझे मार्ग दिखाइए और अपनी दया से मुझे शिक्षा दीजिए।"

हजरत रसूल ने बीमार से कहा, "तू खुदा से दुआ कर कि वह तेरी कठिनाइयों को आसान करे। ऐ खुदा! तू लोग और परलोक में हमें धैर्य और सुख प्रदान कर। जब हमारा निर्दिष्ट स्थान तू ही है तो रास्ते की मंजिल को भी सुखमय बना दे।"

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मित्र की परख


मिस्र-निवासी हजरत जुन्नून ईश्वर-प्रेम में विह्वल होकर पागलों-जैसे आचरण करने लगे। शासन-सूत्र गुण्डों के हाथ में था। उन्होंने जुन्नून को कैद में डाल दिया। जब दुष्ट मनुष्यों को अधिकार प्राप्त होता है तो मंसूर-जैसा सन्त भी सूली पर लटका दिया जाता है। जब अज्ञानियों का राज होता है तो वे नबियों तक को कत्ल करा देते हैं।

जुन्नून पैरों में बेड़ियां और हाथों में हथकड़ियां पहने कैदखाने में पहुंचे। उनके भक्त हाल पूछने के लिए कैदखाने के चारो ओर जमा हो गये। वे लोग आपस में कहने लगे, "हो सकता है कि हजरत जान-बूझकर पागल बने हों। इसमें कुछ-न-कुद भेद जरू है, क्योंकि ये ईश्वर के भक्तों में सबसे ऊंचे हैं। ऐसे प्रेम से भी परमात्मा बचाये, जो पागलपन के दर्जे तक पहुंचा दे।"

इस तरह की बातें करते-करते जब लोग हजरत जुन्नून के पास पहुंचे तो उन्होंने दूर से ही आवाज दी, "कौन हो? खबरदार, आगे न बढ़ना!"


उन लोगों ने निवेदन किया, "हम सब आपके भक्त हैं। कुशल-समाचार पूछने के लिए सेवा में आये हैं। महात्मन्! आपका क्या हाल है? आपको यह पागलपन का झूठा दोष क्यों कर लगाया गया है? हमसे कोई हाल न छिपाकर इस बात को साफ-साफ बतायें। हम लोग आपके हितैषी हैं। अपने भेदों को मित्रों से न छिपाइए।"

जुन्नून ने जब ये बातें सुनीं तो उन्होंने इन लोगों की परीक्षा करने का विचार किया। वे उन्हें बुरी-बुरी गालियां देने और पागलों की तरह ऊट-पटांग बकने लगे। पत्थर-लकड़ी, जो हाथ लगा, फेंक-फेंककर मारने लगे।

यह देखकर लोग भाग निकले। जुन्नून ने कहकहा लगाकर सिर हिलाया और एक साधु से कहा, "जरा इन भक्तों को तो देखो। ये दोस्ती का दम भरते हें। दोस्तों को तो अपने मित्र का कष्ट अपनी मुसीबतों के बराबर होता है, और उनको मित्र से जो कष्ट पहुंचे उसे वह सहर्ष सहन करते हैं।"

[मित्र के कारण मिले हुए कष्टों और मुसीबतों पर खुश होना मित्रता की चिह्न है। मित्र का उदाहरण सोने के समान है और उसके लिए परीक्षा अग्नि के तुल्य है। शुद्ध सोना अग्नि में पड़कर निर्मल और निर्दोष होता है।] 

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बाज और बादशाह


एक बादशाह ने बाज पाल रखा था। वह उस पक्षी से बड़ा प्रेम करता था और उसे कोई कष्ट नहीं होने देता था। एक दिन बाज के दिल में न जाने क्या समायी कि बादशाह को छोड़कर चला गया। पहले तो बादशाह को बहुत रंज हुआ। परन्तु थोड़े दिन बाद वह उसे भूल गया। बाज़ छूट कर एक ऐसे मूर्ख व्यक्ति के हाथ में पड़ गया कि जिसने पहले उसके पर काट डाले और नाखून तराश दिये फिर एक रस्सी से बांध कर उसके आगे घास डाल दी और कहने लगा, "तेरा पहला मालिक कैसा मूर्ख था कि जिसने नाखून भी साफ न कराये, बल्कि उल्टे बढ़ा दिये। देख मैं, आज तेरी कैसी सेवा कर रहा हूं। तेरे बढ़े हुए बालों को काट कर बड़ी सुन्दर हजामत बना दी है और नाखुनों को तराश कर छोटा कर दिया है।

"तू दुर्भाग्य से ऐसे गंवार के पल्ले पड़ गया, जो देखभाल करना भी नहीं जानता था। अब तू यहीं रह और देख कि मैं तुझको किस तरह घास चरा-चरा कर हृष्ट-पुष्ट बनाता हूं।"



पहले तो बादशाह ने बाज का खयाल छोड़ दिया था, लेकिन कुछ दिन बाद उसे फिर उसकी याद सताने लगी। उसने उसको बहुत ढुंढ़वाया, परन्तु कहीं पता न चला। तब बादशाह स्वयं बाज की तलाश में निकला। चलते-चलते वह उसी स्थान पर पहुंच गया, जहां बाज अपने पर कटवाये रस्सी से बंधा घास में मुंह मार रहा था। बादशाह को उसकी यह दशा देखकर बड़ा दु:ख हुआ और वह उसे साथ लेकर वापस चला आया। वह रास्ते में बार-बार यही कहता रहा, "तू स्वर्ग से नरक में क्यों गया था?"

[बाज की तरह आदमी भी, अपने स्वामी परमात्मा को छोड़कर दु:ख उठाता हैं। संसार की माया उसे पंगु बना देती है और मूर्ख मनुष्य अपनी मूर्खता के कामों को भी बुद्धिमानी का कार्य समझते हैं।] १
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हवा और मच्छर का मुकदमा


एक बार एक मच्छर ने न्यायी राज सुलेमान के दरबार में आकर प्राथ्रना की, "हवा ने हमपर ऐसे-ऐसे जुल्म किये हैं कि हम गरीब बाग की सैर भी नहीं कर सकते। जब फूलों के पास जाते हैं तो हवा आकर हमें उड़ा ले जाती है।, जिससे हमारे सुख-साम्राज्य पर हवा के अन्याय की बिजली गिर पड़ती है और हम गरीब आनन्द से वंचित कर दिये जाते हैं। हे पशु-पक्षियों तथा दीनों के दु:ख हरनेवाले, दोनों लोकों में तेरे न्याय-शासन की धूम है। हम तेरे पास इसलिए आये हैं कि तू हमारा इन्साफ करें।"

पैगम्बर सुलेमान ने मच्छर की जब यह प्रार्थना सुनी तो कहने लगे, "ऐ इंसान चाहनेवाले मच्छर! तुझको पता नहीं कि मेरे शासनकाल में अन्याय का कहीं भी नामोनिशान नहीं है। मेरे राज्य में जालिम का काम ही क्या! तुझको मालूम नहीं कि जिसदिन मैं पैदा हुआ था, अन्याय की जड़ उसी दिन खोद दी गयी थी। प्रकाश के सामने अंधेरा कब ठहर सकता है?"


मच्छर ने कहा, "बेशक, आपका कथन सत्य है, पर हमारे ऊपर कृपा-दृष्टि रखना भी तो श्रीमान ही का काम है। दया कीजिए और दुष्ट वायु के अत्याचारों से हमारी जाति को बचाइए।"

सुलेमान ने कहा, "बहुत बच्छा, हम तुम्हारा इंसाफ करते हैं, मगर दूसरे पक्ष का होना भी जरूरी है! जबतक प्रतिवादी उपस्थित न हो और दोनों ओर के बयान न लिखे जाये तबतक तहकीकात नहीं हो सकती, इसलिए हवा को बुलाना जरूरी है।"

सुलमान के दरबार से जब वायु के नाम हुक्म पहुंचा तो वह बड़े वेग से दौड़ता हुआ हाजिर हो गया। वायु के आते ही मच्छर ठहर नहीं सके। उन्हें भागते ही बना। जब मच्छर भाग रहे थे उस समय उनसे सुलेमान ने कहा, "यदि तुम न्याय चाहते हो तो भाग क्यों रहे हो? क्या इसी बलबूते पर न्याय की पुकार कर रहे हो?"

मच्छर बोला, "महाराज, हवा से हमारा जीवन ही नहीं रहता। जब वह आता है तो हमें भागना पड़ता हैं यदि इस तरह न भागें तो जान नहीं बच सकती।"

[यही दशा मनुष्य की है। जब मनुष्य आता है अर्थात जबतक उसमें अहंभाव विद्यमान रहता है, उसे ईश्वर नहीं मिलता और जब ईश्वर मिलता है तो मनुष्य की गन्ध नहीं रहती अर्थात उसका अहंभव बिलकुल मिट जाता है।]१

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मोह का जाल

मोह का जाल


एक लड़का अपने बाप के ताबूत पर फूट-फूटकर रोता ओर सिर पीटता था, "पिताजी, लोग तुम्हें ले जा रहे हैं? ये तुम्हें एक अंधेरे गड्ढे में डाल देंगे, जहां न कालीन है, न बोरिया है, न वहां रात को जलाने के लिए दीपक है, न खाने के लिए भोजन। न इसका दरवाजा खुला है, न बन्द है। न वहां पड़ोसी हैं, जिससे सहारा मिल सके। तुम्हारा पवित्र शरीर, जिसे सम्मानपूर्वक लोग चूमते थे, उस सूने और अंधेरे घर में, जो रहने के बिल्कुल अयोग्य है, जिसमें रहने से चेहरे का रूप और सौन्दर्य जाता रहता है, क्योंकर रहेगा?" इस तरह वह लड़का कब्र का हाल बयान करता था और खून के आंसू उसकी आंखों से टपकते जाते थे। एक मसखरे ने ये शब्द सुनकर अपने आप से कहा, "पिताजी! भगवान् की कसम, मालूम होता है कि ये लोग इस लाश को हमारे घर ले जा रहे हैं।"


बाप ने मसखरे बेटे से कहा, "अरे मूर्ख, यह क्या अनुचित बात कहता है?"

मसखरे ने जवाब दिया "जो निशानियां इसने बतायी हैं, उन्हें तो सुनिए। ये जो चिह्न इसने एक-एक करके गिने हैं, वे वास्तव में सब-के-सब हमारे घर के हैं। हमारे घर मेंभी न बोरिया है, न चिराग हे, न खाना है, न दरवाजा है, न चौक है और न कोठा है।"

[इस तरह के शिक्षा ग्रहण करने के योग्य चिह्न सब मनुष्यों की दशा में विद्यमान हैं, परन्तु वे सांसारिक मोह में फंसे रहने के कारण इनपर ध्यान नहीं देते। यह हृदय, जिसमें ईश्वरीय ज्योति का प्रकाश नहीं पहुंचता, नास्तिक की आत्मा की तरह अन्धकारमय है। ऐसे हृदय से तो कब्र ही अच्छी है।]

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हजरत अली और काफिर


हजरत अली खुदा के शेर थे। उनका आचरण दुर्वासनाओं से मुक्त था। एक बार युद्ध में तलावार लेकर शत्रु की तरफ झपटे। उसने हजरत अली के चेहरे पर थूक दिया। परन्तु हजरत अली अपने क्रोध को दबा गए। उन्होंने उसी समय तलवार फेंकर, इस काफिर पहलवान पर वार करने से हाथ खींच लिया। वह पहलवान उनके इस व्यवहार से ताज्जुब करने लगा कि दया-भाव प्रकट करने का यह क्या अवसर था?

उसने पूछा, "तुम अभी तो मुझप वार करना चाहते थे और अब तुरन्त ही तलवार फेंककर मुझे छोड़ दिया। इसका क्या कारण है! तुमने ऐसी क्या बात देखी कि मुझपर अधिकार प्राप्त करने के बाद भी मुकाबले से हट गये।"

हजरत अली ने कहा, "मैं केवल खुदा के लिए तलवार चलाता हूं, क्योंकि मैं खुदा का गुलाम हूं। अपनी इन्द्रियों का दास नहीं। मैं खुद का शेर हूं दुर्वासनाओं का शेर नहीं। मेरे आचरण धर्म के साक्षी हैं। सन्तोष की तलवार ने मेरे क्रोध को भस्म कर दिया है। ईश्वर का कोप भी मेरे ऊपर दया की वर्षा करता है।


"हजरत पैगम्बर ने मेरे नौकर के कान में फरमाया कि एक दिन वह मेरा सिर तन से जुदा कर दे। वह नौकर मुझसे कहता रहता है कि आप पहले मुझे ही कत्तल कर दीजि, जिससे ऐसा घोर अपराध मुझसे न होने पाये। परन्तु मैं उसे यही जवाब देता हूं—'जब मेरी मौत मेरे हाथ होनेवली है तो मैं खुदा के मुकाबले में बचने की क्यों कोशिश करूं?' इसी तरह दिन-रात मैं अपने कातिल को अपनी आंखों से देखत हूं। मगर मुझे उस पर क्रोध नहीं आता, क्योंकि जिस तरह आदमी को जान प्यारी है, उसी तरह मुझको मौत प्यारी है, क्योंकि इसी मौत से मुझे दूसरा (जन्नत का) जीवन प्राप्त होगा। बिना मौत मरना हमारे लिए हलाल है और आडम्बर रहित जीवन व्यतीत करना हमारे लिए नियामत है।

फिर हजरत अली ने पहलवान से कहा, "ऐ जवान! जबकि युद्ध के समय तूने मेरे मुंह पर थूका तो उसी समय मेरे विचार बदल गये। उस वक्त युद्ध का उद्देश्य आधा खुदा के वास्ते और आधा तेरे जुल्म करने का बदला लेने के लिए हो गया, हालांकि खुदा के काम में दूसरे के उद्देश्य को सम्मिलित करना उतिच नहीं है। तू मेरे मालिक की

बनायी हुई मूरत है और तू उसीकी चीज है। खुद की बनायी हुई चीज को सिर्फ उसीके हुक्म से तोड़ना चाहिए।"

इस काफिर पहलवान ने जब यह उपदेश सुना तो उसे ज्ञान हो गया। कहा, "हाय! अफसोस, मैं अबतक जुल्म के बीज बो रहा था। मैं तो तुझे कुद और समझता था। लेकिन तू तो खुदा का अन्दाज लगाने की न सिर्फ तराजू है, बल्कि उस तराजू की डंडी है। मैं उस ईश्वरीय ज्योति का दास हूं, जिससे तेरा जीवन-दीप प्रकाशित हो रहा है। इसलिए मुझे अपने मजहब का कलमा सिखा, क्योंकि तेरा पद मुझसे बहुत ऊंचा है।"

इस पहलवान के जितने निकट संबंधी और सजातीय थे, सबने उसी वक्त हजरत अली का धर्म ग्रहण कर लिया। हजरत अली ने केवल दया की तलवार से इतने बड़े दल को अपने धर्म में दीक्षित कर लिया।

[दया की तलवार सममुच लोहे की तलवार से श्रेष्ठ है।] १

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बुद्धिमानों का संग

बुद्धिमानों का संग


एक तुर्क घोड़े पर सवार चला आ रहा था। उसने देखा कि एक सोते हुए मनुष्य के मुंह में एक सांप घुस गया। सांप को मुंह से निकालने की कोई युक्ति समझा में न आयी तो मुसाफिर सोनेवाले के मुंह घूंसे लगाने लगा। सोनेवाला गहरी नींद से एकदम उछल पड़ा। देखा, एक तुर्क तड़ातड़ घूंसे मारता जा रहा है। वह मार को सहन न कर सका और उठकर भाग खड़ा हुआ। आगे-आगे वह और पीछे-पीछे तुर्क। एक पेड़ के नीचे पहुंचे। वहां बहुत से सेव झड़े हुए पड़े थे। तुर्क कहा, "ऐ भाई! इन सेवों में से जितने खाये जायें, उतने तू खा। कमी मत करना।"

तुर्कं ने उसे ज्यादा सेव खिलाये कि सब खाया-पिया उगल-उगलकर मुंह से निकालने लगा। उसने तुर्कं से चिल्लाकर कहा, "ऐ अमीर! मैंने तेरा क्या बिगाड़ा था तू मेरी जान लेने पर उतारू हो गया? अगर तू मेरे प्राणों का ही गाहक है तो तलवार के एक ही वार से मेरा जीवन समाप्त कर दे। वह भी क्या बुरी घड़ी थी जबकी मैं तुझे दिखाई दिया।"

वह इसी तरह शोर मचाता और बुरा-भला कहता रहा और तुर्कं बराबर मुक्के-पर मुक्का मारता रहा। उस आदमी का सारा बदन दुखने लगा। वह थककर चूर-चूर हो गया। लेकिन वह तुर्कं दिन छिपने तक मार-पीट करता रहा, यहां तक कि पित्त के प्रकोप से उस आदमी का अब बार-बार बमन होनी शुरु हो गयी। सांप वमन के साथ बहार निकल आया।



जब उसेन अपने पेट से सांप को बाहर निकलते देखा तो डर का कारण थर-थर कांपने लगा। शरीर में जो पीड़ा घूंसों की मार से उत्पन्न हो गयी थी, वह तुरन्त जाती रही।

वह आदमी तुर्कं के पैरों पर गिर पड़ा और कहने लगा, "तू तो दया का अवतार है और मेरा परम हितकारी है। मैं तो मर चुका था। तूने ही मुझे नया जीवन दिया है। ऐ मेरे बादशाह, अग तू सच्चा हाल जरा भी मुझे बाता देता साथ ऐसी अशिष्टता क्यों करता है? परन्तु तूने अपनी खामोशी से मुझे हैरान कर दिया, और बिना कारण बताए बदन पर घूंसा मारने लगा। ऐ परोपकारी पुरुष! जो कुछ गलती से मेरे मुंह से निकल गया, उसके लिए मुझे क्षमा करना।"

तुर्कं ने कहा, "अगर मैं इस घटना का जरा भी संकेत कर देता ता उसी समय तेरा पित्त हो जाता और डर के मारे तेरी आधी जान निकल जाती। उस समय न तुझमें

इतने सेव खाने की हिम्मत होती और न उल्टी होने की नौबत आती है। इलिए मैं तो तेरे दुर्वचनों को भी सहन करता रहा। कारण बताना उचित नहीं था और तुझे छोड़ना भी मुनासिब नही था।"

[बुद्धिमानों की शत्रुता भी ऐसी होती है कि उनका दिया हुआ विष भी अमृत हो जाता है। इसके विपरीत मूर्खो की मित्रता से दु:ख और पथ-भ्रष्टता प्राप्त हाती है।]
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