बाहर से जवाब मिला, 'मैं' हूं।"
प्रेमपात्र ने कहा, "तुम्हें लौट जाना चाहिए। अभी भेंट नहीं हो सकती। तुम जैसी कच्ची चीज के लिए यहां स्थान नहीं।"
उसने समझा कि प्रेमपात्र का मुझसे अपमान हुआ है।
यह जवाब सुनकर वह बेचारा प्रेमी निराश होकर अपने प्रेमपात्र के द्वारा से लौट गया। बहुत दिनों तक वियोग की आग में जलता रहा। अन्त में उसे फिर प्रेमपात्र से मिलने की उत्कण्ठा हुई और उसके द्वार पर चक्कर काटने लगा। कहीं फिर काई अपमानसूचक शब्द मुंह से न निकल जाये, इसलिए उसने डरते-डरते कुंडी खटखटायी। प्रेमपात्र ने भीतर से पूछा, "दरवाजे पर कौन है?"
उसने उत्तर दिया, "ऐ मेरे प्यारे, 'तू' ही है।"
प्रेम-पात्र ने आज्ञा दी कि अब जबकि 'तू' 'मैं' ही है, तो अन्दर चला आ।"
[एकता में दो की गुंजाइश नहीं। जब एक ही एक है तो फिर दुई कहां?] १





